美国总统特朗普23日表示,9月1日起将对价值3000亿美元商品加征15%关税,而非之前他宣布的10%。另外,目前被征收25%关税的2500亿中国商品,税率将在10月1日升至30%。
特朗普在推特上说,这一举措是回应中国在当日较早前的加税决定。中国此前宣布,将对价值750亿美元的美国商品加征10%、5%不等关税,分两批在9月1日、12月15日起实施。
随着中美两国同日内分别加征关税,贸易战升级至前所未有的高度。
特朗普在推文中写道:“中国不应该对750亿美元美国产品征新的税收(这是出于政治动机!)”
中国计划对美加税的商品涉及5078种产品,其中包括大豆等农产品、原油和小型飞机。曾被加征关税、后又被移除的汽车与零部件,也重回关税清单。
中国对美国农产品的关税已持续超过一年,对美国农民带来沉重打击。特朗普近期经常在推特上向“伟大的爱国农民”保证,国家将会补贴农民的损失。
中国国务院在23日(周五)的公告中写道:“中方采取加征关税措施,是应对美方单边主义、贸易保护主义的被迫之举。”
美国股市23日纷纷下跌,道琼斯、纳斯达克、标普500指数以2.5%到3%的跌幅收市。
8月1日,特朗普曾说将从9月1日起向3000亿美元的中国商品加征10%关税。9月1日也是中美贸易谈判下一轮会面的日期。其后,美国政府又宣布,部分关税将延迟至12月15日实施,还有部分商品被剔除出加税名单。
中方此番加税反制,在关税实施的时间上完全匹配了美国的上述关税威胁。但鉴于中美向对方出口的商品总额相差悬殊,中国无法在征税的商品价值总量上匹配美国,可能还会以非关税措施反制美国。中国观察家利明璋(Bill Bishop)曾指出,这些潜在手段包括出台“不可靠实体清单”、对美商投资展开安全审查、增加海关检查、取消与美国企业的订单、骚扰美企驻华雇员等。中国商务部发言人高峰在22日表示,不可靠实体清单将于近期发布。
中国宣布加税计划后,特朗普在23日周五接连发出超过十则针对中国的推文,称“我们不需要中国”、“中国每年偷窃我们几千亿美元”,并要求所有美国企业马上寻找能替代中国的其他国家作为供应商,或将生产线搬回美国。
除此之外,特朗普指责中国还未履行阻止芬太尼流入美国的承诺,他要求联邦快递、UPS、亚马逊、美国邮政等公司拒绝递送来自中国的芬太尼药品。
中国官媒《人民日报》23日发表文章称,中国严格管控芬太尼,美方企图将芬太尼滥用的责任推卸给中国。”美国一些人得想明白,病根子就在自己身上。既不能病急乱投医,也不能一有病痛就骂人。“
也有人指出,特朗普的推文中存在多处事实错误。他指,芬太尼每年导致10万美国人死亡,但美国官方估计,去年死于鸦片类药物的人数约为32000人,是史上最高数字,但与10万相去甚远。
特朗普还称,过去两年半中,美国经济成长比中国大得多。然而,美国的国内生产总值约21.3万亿美元,近年的经济增长率约2%;中国国内生产总值约14.2万亿美元,以约6.6%速率增长。按照这些数据估算,中国在过去两年半的经济成长高于美国。
特朗普周五上午的推特风暴,还包括向美联储施压。他在推文中写道:“现在应该是美联储拿出他们本事来的时候了!”他又提问谁是美国最大的敌人,是(美联储主席)鲍威尔(Jerome Powell)还是习近平主席?
Monday, August 26, 2019
Monday, August 19, 2019
कश्मीर पर नेहरू को विलेन बनाना कितना सही
ये कहानी बँटवारे के समय की है, जब दक्षिण एशिया में दो देश भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए. उस दौरान कुछ देसी रियासतें भी थीं जो इन नए बने दोनों देशों में शामिल हो रही थीं.
पश्चिमी हिस्से सौराष्ट्र के पास जूनागढ़ इन्हीं में एक बड़ी रियासत थी. यहां की 80 फ़ीसदी हिंदू आबादी थी जबकि यहां से शासक मुस्लिम नवाब महबत ख़ान तृतीय थे.
यहां अंदरूनी सत्ता संघर्ष भी चल रहा था और मई 1947 में सिंध मुस्लिम लीग के नेता शाहनवाज़ भुट्टो को यहां का दीवान (प्रशासक) नियुक्त किया गया. वो मुहम्मद अली जिन्ना के क़रीबी संपर्क में थे.
जिन्ना की सलाह पर भुट्टो ने 15 अगस्त 1947 तक भारत या पाकिस्तान में शामिल होने पर कोई फ़ैसला नहीं लिया.
हालांकि जैसे ही आज़ादी की घोषणा हुई, जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ जाने का फ़ैसला ले लिया था जबकि पाकिस्तान ने एक महीने तक इस अपील का कोई जवाब नहीं दिया.
13 सितंबर को पाकिस्तान ने एक टेलीग्राम भेजा और जूनागढ़ को पाकिस्तान के साथ मिलाने की घोषणा की. काठियावाड़ सरकार और भारत सरकार के लिए भी ये एक बड़ा झटका था.
असल में जिन्ना जूनागढ़ को एक प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और राजनीति की बिसात पर उनकी नज़र कश्मीर पर थी.
जिन्ना इस बात से निश्चिंत थे कि भारत कहेगा कि जूनागढ़ के नवाब नहीं बल्कि वहां की जनता को फ़ैसला लेने का अधिकार होना चाहिए. जब भारत ने ऐसा दावा किया, जिन्ना ने यही फॉर्मूला कश्मीर में लागू करने की मांग की. वो भारत को उसी के जाल में फंसाना चाहते थे.
राजमोहन गांधी ने सरकार पटेल की जीवनी 'पटेल: अ लाइफ़' में ये बातें लिखी हैं.
अब भारत की बारी थी कि वो पाकिस्तान की योजना को विफल करे और इसकी ज़िम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल पर थी.
पाकिस्तान की ओर से 22 अक्टूबर 1947 को क़रीब 200-300 ट्रक कश्मीर में आए. ये ट्रक पाकिस्तान के फ़्रंटियर प्रोविंस के क़बायलियों से भरे थे.
ये संख्या में क़रीब 5000 थे और अफ़रीदी, वज़ीर, मेहसूद क़बीलों के लोग थे.
उन्होंने ख़ुद को स्वतंत्रता सेनानी कहा और उनका नेतृत्व पाकिस्तान के छुट्टी पर गए सिपाही कर रहे थे.
उनकी मंशा साफ़ थी, कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर उसे पाकिस्तान में मिलाना, जो कि उस समय तक इस बात पर अनिश्चित था कि वो भारत के साथ जाए या पाकिस्तान के साथ. उस समय लगभग सभी रियासतें पाकिस्तान या भारत के साथ जा चुकी थीं लेकिन जम्मू और कश्मीर असमंजस में था.
12 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान के साथ यथास्थिति संबधी समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया.
समझौते का मतलब था कि जम्मू-कश्मीर किसी भी देश के साथ नहीं जाएगा बल्कि स्वतंत्र बना रहेगा. इस समझौते के बाद भी पाकिस्तान ने इसका सम्मान नहीं रखा और राज्य पर हमला बोल दिया.
वीपी मेनन ने अपनी क़िताब 'द स्टोरी ऑफ़ द इंटीग्रेशन ऑफ़ इंडियन स्टेट्स' में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की आक्रामक कार्रवाई पर विस्तार से लिखा है.
हमला करने वाले कबायली एक के बाद एक इलाक़े क़ब्ज़ा कर रहे थे और 24 अक्टूबर को श्रीनगर के क़रीब पहुंच गए. वे माहुरा पावर हाउस पहुंचे और उसे बंद करा दिया, जिससे पूरा श्रीनगर अंधेरे में डूब गया.
कबायली लोगों से कह रहे थे कि दो दिनों में वो श्रीनगर को क़ब्ज़ा कर लेंगे और वो शहर की मस्जिद में ईद मनाएंगे.
महाराजा हरि सिंह उन क़बायलियों से लड़ने में ख़ुद को अक्षम पा रहे थे. ऐसे समय में जब राज्य उनके हाथ से जा रहा था, उन्होंने स्वतंत्रता की बात भुला कर भारत से मदद की गुहार लगाई.
पश्चिमी हिस्से सौराष्ट्र के पास जूनागढ़ इन्हीं में एक बड़ी रियासत थी. यहां की 80 फ़ीसदी हिंदू आबादी थी जबकि यहां से शासक मुस्लिम नवाब महबत ख़ान तृतीय थे.
यहां अंदरूनी सत्ता संघर्ष भी चल रहा था और मई 1947 में सिंध मुस्लिम लीग के नेता शाहनवाज़ भुट्टो को यहां का दीवान (प्रशासक) नियुक्त किया गया. वो मुहम्मद अली जिन्ना के क़रीबी संपर्क में थे.
जिन्ना की सलाह पर भुट्टो ने 15 अगस्त 1947 तक भारत या पाकिस्तान में शामिल होने पर कोई फ़ैसला नहीं लिया.
हालांकि जैसे ही आज़ादी की घोषणा हुई, जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ जाने का फ़ैसला ले लिया था जबकि पाकिस्तान ने एक महीने तक इस अपील का कोई जवाब नहीं दिया.
13 सितंबर को पाकिस्तान ने एक टेलीग्राम भेजा और जूनागढ़ को पाकिस्तान के साथ मिलाने की घोषणा की. काठियावाड़ सरकार और भारत सरकार के लिए भी ये एक बड़ा झटका था.
असल में जिन्ना जूनागढ़ को एक प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और राजनीति की बिसात पर उनकी नज़र कश्मीर पर थी.
जिन्ना इस बात से निश्चिंत थे कि भारत कहेगा कि जूनागढ़ के नवाब नहीं बल्कि वहां की जनता को फ़ैसला लेने का अधिकार होना चाहिए. जब भारत ने ऐसा दावा किया, जिन्ना ने यही फॉर्मूला कश्मीर में लागू करने की मांग की. वो भारत को उसी के जाल में फंसाना चाहते थे.
राजमोहन गांधी ने सरकार पटेल की जीवनी 'पटेल: अ लाइफ़' में ये बातें लिखी हैं.
अब भारत की बारी थी कि वो पाकिस्तान की योजना को विफल करे और इसकी ज़िम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल पर थी.
पाकिस्तान की ओर से 22 अक्टूबर 1947 को क़रीब 200-300 ट्रक कश्मीर में आए. ये ट्रक पाकिस्तान के फ़्रंटियर प्रोविंस के क़बायलियों से भरे थे.
ये संख्या में क़रीब 5000 थे और अफ़रीदी, वज़ीर, मेहसूद क़बीलों के लोग थे.
उन्होंने ख़ुद को स्वतंत्रता सेनानी कहा और उनका नेतृत्व पाकिस्तान के छुट्टी पर गए सिपाही कर रहे थे.
उनकी मंशा साफ़ थी, कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर उसे पाकिस्तान में मिलाना, जो कि उस समय तक इस बात पर अनिश्चित था कि वो भारत के साथ जाए या पाकिस्तान के साथ. उस समय लगभग सभी रियासतें पाकिस्तान या भारत के साथ जा चुकी थीं लेकिन जम्मू और कश्मीर असमंजस में था.
12 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान के साथ यथास्थिति संबधी समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया.
समझौते का मतलब था कि जम्मू-कश्मीर किसी भी देश के साथ नहीं जाएगा बल्कि स्वतंत्र बना रहेगा. इस समझौते के बाद भी पाकिस्तान ने इसका सम्मान नहीं रखा और राज्य पर हमला बोल दिया.
वीपी मेनन ने अपनी क़िताब 'द स्टोरी ऑफ़ द इंटीग्रेशन ऑफ़ इंडियन स्टेट्स' में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की आक्रामक कार्रवाई पर विस्तार से लिखा है.
हमला करने वाले कबायली एक के बाद एक इलाक़े क़ब्ज़ा कर रहे थे और 24 अक्टूबर को श्रीनगर के क़रीब पहुंच गए. वे माहुरा पावर हाउस पहुंचे और उसे बंद करा दिया, जिससे पूरा श्रीनगर अंधेरे में डूब गया.
कबायली लोगों से कह रहे थे कि दो दिनों में वो श्रीनगर को क़ब्ज़ा कर लेंगे और वो शहर की मस्जिद में ईद मनाएंगे.
महाराजा हरि सिंह उन क़बायलियों से लड़ने में ख़ुद को अक्षम पा रहे थे. ऐसे समय में जब राज्य उनके हाथ से जा रहा था, उन्होंने स्वतंत्रता की बात भुला कर भारत से मदद की गुहार लगाई.
Thursday, August 8, 2019
欠薪包工头肆意失信违约 轻信承诺书挂靠公司受牵连
“我承诺发放到每一名农民工手中,承诺工人不到政府、甲方单位和发包公司滋事,否则一切后果由我负责。”近日,沈阳某建筑劳务有限公司总经理杜俊拿出一张“农民工工资支付承诺书”。这是5年前包工头叶尚兴写下的,本以为是撇清责任的“王牌”,然而去年叶尚兴不知所踪,讨工钱的农民工张洪洋将劳务公司告上法庭,大连市中山区人民法院判决公司承担连带清偿责任。
“自然人包工头承诺书”“农民工工资支付承诺书”“不拖欠农民工工资承诺书”……近年来,为保障农民工工资按时支付,一些包工头挂靠的劳务公司要求包工头签下承诺支付农民工工资的承诺书。然而,《工人日报》记者采访发现,本应当是治理拖欠农民工工资的良方,却因承诺书内容模糊,违约责任约定不清,没有第三方担保人,致使许多欠薪包工头肆意失信违约,劳务公司受牵连,纠纷不断。
包工头一纸承诺不作数
杜俊的劳务公司成立于2011年。2014年3月,他将大连东港商务区2号楼、4号楼的砌砖工程发包给没有资质的包工头叶尚兴。当年9月工程结算时,工程“甲方”某建设集团有限公司大连分公司要求他签下一份“不拖欠农民工工资承诺书”:“为做到不拖欠农民工工资,本人以公司法定代表人的身份,承诺按照合同规定及时给付农民工工资。如果发生拖欠,我公司愿意接受总承包单位的处罚,同时愿意接受建设行政主管部门的相关处罚决定。”
杜俊觉得此举不错,担心会出现包工头不支付农民工工资的风险,他就如法炮制,让叶尚兴也签下了类似的承诺书。“我叫叶尚兴,已收到工程款和劳务费968658元,领取工资后,我承诺发放到每一名农民工手中……”叶尚兴签字盖章后,杜俊安心地叫会计转了账。然而,他担心的事儿还是发生了。
2014年9月,叶尚兴跑路。被欠薪的农民工张洪洋将叶尚兴和杜俊的劳务公司同时告上法庭。法庭审理后认为,根据《建设领域农民工工资支付管理暂行办法》第十二条规定,工程总承包企业不得将工程违反规定发包、分包给不具备用工主体资格的组织和个人,否则应承担清偿拖欠工资连带责任。因此,叶尚兴失踪,杜俊的劳务公司应当给付劳务费3万元。
“白纸黑字的承诺,怎么拿到法庭上就不作数了呢?”杜俊认为,自己确实存在违规发包行为,愿意接受相关部门的处罚。但谁欠债谁还钱,自己手中的转账凭证和叶尚兴的“承诺书”能够证明工钱已付,为何还要给农民工付钱。为此,他不服判决,申请了二审。
挂靠公司承担连带责任的不只有这一次。2015年,大连一包工头蒋林因拖欠农民工工资70.8万元被判有期徒刑2年。大连市中级人民法院判决蒋林挂靠的大连久盛建筑劳务有限公司承担连带责任。当时,蒋林也签有类似的承诺书。
在建筑业工作12年的沈阳某劳务公司总经理董源透露,建设企业向政府写承诺书,承包单位向建设企业写承诺书,包工头再向承包单位写承诺书,以签承诺书的方式来保障农民工工资发放的方式确实起到了一定的震慑作用。然而,到了法庭上,为何承诺书却成了没有刀锋、只能吓唬人的“木剑”?
“自然人包工头承诺书”“农民工工资支付承诺书”“不拖欠农民工工资承诺书”……近年来,为保障农民工工资按时支付,一些包工头挂靠的劳务公司要求包工头签下承诺支付农民工工资的承诺书。然而,《工人日报》记者采访发现,本应当是治理拖欠农民工工资的良方,却因承诺书内容模糊,违约责任约定不清,没有第三方担保人,致使许多欠薪包工头肆意失信违约,劳务公司受牵连,纠纷不断。
包工头一纸承诺不作数
杜俊的劳务公司成立于2011年。2014年3月,他将大连东港商务区2号楼、4号楼的砌砖工程发包给没有资质的包工头叶尚兴。当年9月工程结算时,工程“甲方”某建设集团有限公司大连分公司要求他签下一份“不拖欠农民工工资承诺书”:“为做到不拖欠农民工工资,本人以公司法定代表人的身份,承诺按照合同规定及时给付农民工工资。如果发生拖欠,我公司愿意接受总承包单位的处罚,同时愿意接受建设行政主管部门的相关处罚决定。”
杜俊觉得此举不错,担心会出现包工头不支付农民工工资的风险,他就如法炮制,让叶尚兴也签下了类似的承诺书。“我叫叶尚兴,已收到工程款和劳务费968658元,领取工资后,我承诺发放到每一名农民工手中……”叶尚兴签字盖章后,杜俊安心地叫会计转了账。然而,他担心的事儿还是发生了。
2014年9月,叶尚兴跑路。被欠薪的农民工张洪洋将叶尚兴和杜俊的劳务公司同时告上法庭。法庭审理后认为,根据《建设领域农民工工资支付管理暂行办法》第十二条规定,工程总承包企业不得将工程违反规定发包、分包给不具备用工主体资格的组织和个人,否则应承担清偿拖欠工资连带责任。因此,叶尚兴失踪,杜俊的劳务公司应当给付劳务费3万元。
“白纸黑字的承诺,怎么拿到法庭上就不作数了呢?”杜俊认为,自己确实存在违规发包行为,愿意接受相关部门的处罚。但谁欠债谁还钱,自己手中的转账凭证和叶尚兴的“承诺书”能够证明工钱已付,为何还要给农民工付钱。为此,他不服判决,申请了二审。
挂靠公司承担连带责任的不只有这一次。2015年,大连一包工头蒋林因拖欠农民工工资70.8万元被判有期徒刑2年。大连市中级人民法院判决蒋林挂靠的大连久盛建筑劳务有限公司承担连带责任。当时,蒋林也签有类似的承诺书。
在建筑业工作12年的沈阳某劳务公司总经理董源透露,建设企业向政府写承诺书,承包单位向建设企业写承诺书,包工头再向承包单位写承诺书,以签承诺书的方式来保障农民工工资发放的方式确实起到了一定的震慑作用。然而,到了法庭上,为何承诺书却成了没有刀锋、只能吓唬人的“木剑”?
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